red data book kya hai । रेड डाटा बुक की रिपोर्ट और भारत में लुप्तप्राय जानवर

रेड डाटा बुक की रिपोर्ट और भारत में लुप्तप्राय जानवर

रेड डाटा बुक एक ऐसा दस्तावेज या बुक होता है जिस में किसी राष्ट्र या राज्य के द्वारा अपने सीमाओं के अंदर जानवरों और पौधों की हर लुप्तप्राय यानी गायब होने वाले और दुर्लभ प्रजातियों का रिकॉर्ड रखा जाता हैं। ऐसे ही एक IUCN रेड लिस्ट एक ऐसा डेटाबेस है जो हमें प्रकृति के विभिन्न जीव जंतुओं की सुरक्षा स्थिति और उनके बिस्तर पर जानकारी प्रदान करता है।

आइये जानते हैं कि red data book kya hai व रेड डाटा बुक की रिपोर्ट और भारत में लुप्त प्राय जानवरों के बारे में। विस्तृत विवरण इस प्रकार है।

इसमें हमें यह मालूम होता है कि किस प्रकार की जीव जंतु किस स्थिति में है और उनके जनसंख्या में कितनी भिन्नता है। यह हमें ग्लोबल से लेकर छोटे स्तर पर वानिया जीव संरक्षण के लिए सहायक निर्देश देता है। इसके माध्यम से हम बिल्कुल सही निर्णय ले सकते हैं, जिससे जीव जंतुओं की सुरक्षा और विनय जीव समुदाय के बारे में और भी विस्तार से जान सकते हैं।

 

साथ ही रेड डाटा बुक में भारत में कुछ ऐसे लिखते जानवरों के बारे में बताया गया है जिस पर अगर ध्यान नहीं दिया जाए तो वह जल्द ही विलुप्त हो सकते हैं। तो आइये इस लेख के माध्यम से हम जानते हैं भारत में वह कौन से जीव जंतु है जिनकी विलुप्त होने का संभावना अधिक है।

भारत में लुप्तप्राय जानवर (red data book kya hai)

रेड डाटा बुक के अनुसार इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर यानी IUCN ने भारत में मौजूद 132 प्रजातियों की सूची बताई है जिनके बारे में हम नीचे बताने वाले हैं। तो आईए जानते हैं इनमें से किन्ही प्रमुख प्रजातियां के बारे में।

हिमालय मोनल, तीतर – लोफोफोरस इम्पेजनुस  (लैथम)

 

 

हिमालय मोनल एक बहुत ही सुंदर पक्षी होती है इसके रंग-red data book kya hai । रेड डाटा बुक की रिपोर्ट और भारत में लुप्तप्राय जानवरबिरंगी पंख होते हैं। कई लोकप्रिय और स्थानीय लोक कथाओं में इसका वर्णन किया जाता हैं। यह मध्य से पूर्वी अफगानिस्तान, नेपाल, भारत, उत्तरी पाकिस्तान, भूटान और तिब्बत के दक्षिणी इलाके में दिखाई देता है। बर्मा में भी इसके होने के रिपोर्ट बाहर आए हैं।

भारतीय बस्टर्ड – अरडॉटइस निग्रिकेप्स (विगोर्स) महान

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इंडियन बस्टर्ड एक ऐसा बस्टर्ड है जो पाकिस्तान और भारत के निकटवर्ती इलाकों में पाया जाता है। पहले के समय में यह भारतीय उपमहाद्वीप के सूखे मैदाने पर देखा जाता था लेकिन अभी के समय में इसकी जनसंख्या बहुत कम हो गई है और यह विलुप्त होने के कगार पर आ गया है। लगातार शिकार होने और अपने आवास पर खतरे के कारण इनकी आबादी कम हो गई है। यह अभी के समय में राजस्थान गुजरात और महाराष्ट्र के अहमदनगर के सुखी खास के मैदाने पर ही पाए जाते हैं।

सारस क्रेन (ग्रूस अन्तिगोने)

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यह एक बड़े गौर- प्रवासी क्रेन होते हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में पाए जाते हैं। इन्हें दूसरों क्रेन के तुलना में आसानी से पहचाना जा सकता है क्योंकि इनका रंग ग्रे होता है और विषम लाल सिर होती है। साथ ही उनकी गर्दन भी काफी ज्यादा लंबी होती हैं। इन्हें खाने में जडें, कीड़े और सब्जियां पसंद होती है, जिसे खाने के लिए यह तालाब या दलदल में जाते हैं। इनकी जनसंख्या भी काफी कम हो गई है।

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जेर्डोन कर्सर (क्रसोरियस बिटोरकातुस) (ब्लिथ)

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यह दुनिया में मौजूद नया पक्षियों में से एक माना गया है। IUCN ने इसका नाम गंभीर खतरे की सूची में डाला है क्योंकि यह एक ही साइट और वास में रहता है जो की धीरे-धीरे कम होते जा रहा है। यह खास तौर पर भारत के अनंतपुर, कुडप्पा, नेल्लौर, भद्राचलम, और आंध्र प्रदेश के पूर्वी तट पर पाया जाता है। रेड बुक के अनुसार इनकी आबादी बहुत कम हो गई है और ध्यान न देने पर यह बहुत जल्द ही विलुप्त हो सकते हैं।

गंगा नदी डॉल्फिन – प्लेटेनिस्टा गैन्गेटिक

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पहले के समय में गंगा नदी में मौजूद डॉल्फिन का शिकार किया जाता था और इसी के कारण इनकी जनसंख्या धीरे-धीरे काफी कम हो गई है। इस सूची में इस प्रजाति का नाम आने के बाद सरकार द्वारा घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए शिकार करना प्रतिबंधित कर दिया गया है। गंगा नदी में पहले की तुलना में यह काफी कम दिखाई देते हैं और मात्र कुछ ही संख्या में यह पाए जाते हैं। नदी पॉल्यूशन के कारण भी कई सारी डॉल्फिन की मृत्यु हो गई है और उनका शरीर गंगा के किनारे किसी तट पर मिलता है।

एशियाटिक लायन – पेन्थेरा लियो पर्सिका (मेयर)

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यह बब्बर शेर के रूप में भी माना जाता है। यह प्रजाति भारत के काठियावाड़ गुजरात में गिर वन में ही पाया जाता है। एशिया से भारत में पाई जाने वाली पांच प्रमुख बड़ी बिल्लियों में से एक माना गया है, इसमें से चार भारतीय तेंदुआ, बंगाल टाइगर, हिम तेंदुआ और चीते होते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी पूर्वी हिस्सों में पहले उनकी जनसंख्या काफी ज्यादा होती थी लेकिन लगातार शिकार और निवास के विनाश के कारण इनकी गिनती काफी कम हो गई है। यह सिर्फ गुजरात में ही पाए जाते हैं।

नीलगिरि लंगूर (प्रेस्बायटिस जोहनी)

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नीलगिरी लंगूर दक्षिणी भारत में पश्चिमी घाट के नीलगिरी पहाड़ियों पर पाए जाते हैं। साथ ही यह कर्नाटक में कोडागू, तमिलनाडु में कोङयार हिल्स और साथ ही केरल और तमिलनाडु के कई और पहाड़ी क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं। इनकी जनसंख्या जंगलों की लगातार कटाई के कारण काफी ज्यादा काम हो गई है। साथ ही इन जानवरों के फार और मांस के लिए शिकार किया जाता था जिसके कारण इनकी आबादी में काफी ज्यादा गिरावट आई है।

 

कृष्णमृग – एंटीलोप सर्विकाप्रा  (लिनिअस)

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यह एक मृग प्रजाति होती है जो भारतीय उपमहाद्वीपों के मूल निवासी हैं। साल 2003 के बाद इन्हें IUCN के सूची में डाला गया जब उनकी जनसंख्या में काफी ज्यादा गिरावट होने लगी। इनकी आबादी में सबसे ज्यादा कमी 20वीं शताब्दी के दौरान हुआ। आज के समय में कृष्ण मृग उड़ीसा राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक और तमिलनाडु के क्षेत्र में पाए जाते हैं। भारत में उनकी हत्या या शिकार करना गैर कानूनी माना गया है।

ओलिव रिडले समुद्री कछुए – लेपिडोचेलयस ओलिवासा

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यह कछुआ जीने के लिए एकांत पसंद करते हैं और साथ ही इन्हें खुले समुद्र भी पसंद होते हैं। यह कई हजार सालों तक अकेले एक जगह से दूसरे जगह पलायन करते रहते हैं और केवल एक वर्ष में एक बार एक समूह के रूप में साथ आते हैं। भारत महासागर में उड़ीसा में गहिरमाथा के पास दो या तीन इन प्रजाति के कछुए पाए गए हैं। इसके अंतर्गत इनकी प्रजाति भी काफी ज्यादा काम हो गई है और विलुप्त होने के कगार पर हैं।

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